अध्याय 268

आख़िरी वाक्य तो मानो गुर्राकर ही निकला।

निजी कमरे की गर्म हवा जैसे पल भर में ही खिंचकर सूख गई। मेज़ पर रखे लज़ीज़ पकवानों की खुशबू अभी भी उठ रही थी, मगर वह हल्का-फुल्का, जश्नी माहौल पूरी तरह गायब हो चुका था।

कमरे में इतनी ख़ामोशी थी कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे। सबने साँस रोक ली, हैरानी और अस...

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